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Suresh Kulkarni

Abstract

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Suresh Kulkarni

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किनारा

किनारा

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ताकत मन की जान ना पाऊॅं

अंतर्मुख पल पल हो जाऊॅं

धडकन दिलकी रोक ना पाऊॅं

जिसे रोक सके ना कोई !


गगन मे तारे चमकत खिन खिन

और अंधेरा छाये कण कण

तनमन तडपे अविरत निसी दिन

रोक सके तो रोक ये तडपन


सागमे जब लहरे उठती

नित नयी खलबली मचे

उठती है मनमे भी तरंगे

कौन करे इस मनको चुप


पवन का झोंका तेज चले 

आसमान मे धूल उडे

कौन सॅंवारे इस तूफ़ान को

तहस नहस सब कुछ कर दे


उम्मीदों का जब मिले सहारा

ये जीवन नैया आगे बढे

पर कामयाबी पर कभी गर्व ना करना

गर्वके भवर मे नैया घूमे

फिर राही भटके दिशा छोड के

मंज़िल कहीं और तू कहाॅं पर !



साहित्याला गुण द्या
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