STORYMIRROR

Sukhnandan Bindra

Abstract Others

4  

Sukhnandan Bindra

Abstract Others

ख्वाहिशें

ख्वाहिशें

1 min
418

हज़ारों ख्वाहिशें पलती है

हरेक जीवन के अंदर

रोज़ जीती रोज़ मरती हैं ऐसे

अनादि से अनंत की कोई यात्रा हो जैसे


मन की सीली मिट्टी पर डाले बिछौना

ख्वाहिशें सोई रहती हैं ऐसे

बुझी ठंडी राख के नीचे कोई

तेज़ चिंगारी दबी हो जैसे


न कोई हमसफ़र न हमराह फिर भी

खयालों में दूर तक निकल जाती हैं ऐसे

जैसे बियाबान जंगल में कोई

हिरणी कुलांचे भरती हो जैसे


हर ख्वाहिश रूहानी है

हरेक की अपनी ही कहानी है

कुछ मुकम्मल कुछ अधूरी ऐसे

अधरों पर मुस्कान संग नैनों में सूनापन जैसे


जीवन है वहां ख्वाहिशें हों जहाँ

ख़्वाहिशों के बग़ैर ज़िंदगी कहाँ

बेरौनक ज़िंदगी में प्राण फूंकती हैं ऐसे

तपते रेगिस्तान में पानी का झरना जैसे

प्यारी-प्यारी, छोटी छोटी सी

ख्वाहिशें ज़रूर पालिये

जब भी वक़्त मिले पूरी के डालिये

ख्वाहिशें ज़िंदा होने की पहचान हैं

इन्हीं से जीवन में सुर लय तान है

जिस दिन ख्वाहिशें मुरझायेंगी

ज़िंदगी बेरंग बेरौनक बेनूर हो जाएगी



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract