STORYMIRROR

Kusum Joshi

Inspirational

3  

Kusum Joshi

Inspirational

ख़्वाहिश

ख़्वाहिश

1 min
333

लपक कर चाँद को छूने की,

ख़्वाहिश को लिए मन में,

ना जाने कब धरा को,

दूर नीचे छोड़ आया हूँ।


बनाने एक बड़ा सा,

आशियाना दूर अम्बर में,

इसी सपने को जीता,

घर मैं अपना छोड़ आया हूँ।


ज़मीं नहीं पैरों में मेरे,

मिला ना आसमाँ भी अब तक,

सपनों में जीता मैं,

हक़ीक़त के धागे तोड़ आया हूं।


दीदार होगा चाँद का,

विश्वास दृढ़ मेरा,

इसी विश्वास में सब डर पुराने,

छोड़ आया हूँ।


लपककर चाँद को छूने की,

ख़्वाहिश को लिए मन में,

ना जाने कब धरा को,

दूर नीचे छोड़ आया हूँ।।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational