खुश
खुश
सारी उम्र एक स्त्री की ,गुज़र जाती है दूसरों की खुशी में ,
मगर फिर भी उसे मिल नहीं पाती ,वो खुशी जो चाहती वो ज़िन्दगी में |
बचपन से ही सिखाया जाता ,मिलकर चलने का सबक निराला ,
बाँट - बाँट कर खाना सीखो ,कर दो आगे खुद के मुँह का निवाला |
बड़े होने पर भाई - पिता की ,हर बात को सुनना सीखो ,
माँ के काँधो का भी बोझ ,खुद के काँधो पर सहना सीखो |
ब्याह हुआ तो नये परिवार के ,सारे नखरे - नाज़ उठा लो ,
उस पर भी गर उनका जी न भरे तो ,पति - परमेश्वर के घूँसे और लातें खा लो |
धीरे - धीरे मायके का मोह त्याग कर ससुराल में ही बस अपना दिल लगाना ,
किसी लंगर की भांति अब सारा जीवन ,मायके और ससुराल वालों की ख़ुशी में बिताना |
बेचारी स्त्री पढ़ - लिख कर भी अब ,बस लगी रहती है इसी उधेड़बुन में ,क
भी पति और बच्चों को खुश करती ,तो कभी चली जाती मायके के हाल सुनने |
कभी भाई दरवाजे पर गुर्राने लगता ,तो भाभी भी उसमे पूरा साथ निभाती ,
मगर वो भोली स्त्री तब भी आकर ,ससुराल में पीहर के गुण गाती जाती |
इधर पति भी स्वाभिमान होने का दंभ दिखाता ,ससुराल वालों पर बेवजह तोहमत लगाता ,उधर मायके वाले भी सामंजस्य बैठा ना पाते ,दामाद को अक्सर खरी - खोटि सुनाते |
फिर भी स्त्री दोनो तरफ का बोझ ढ़ोती जाती ,हर एक को खुश रखने की तरकीब लगाती ,
मगर ये चालाक ज़माना उसे जीने ना देता ,मानसिक और शारीरिक यातनायें अक्सर देता |
और अंत में वो एक दिन बुरी तरह हार जाती ,सबको खुश करते करते खुशी से गम लगे लगाती ,उस वक़्त भी कोई ये बात कभी नहीं समझ पाता ,कि स्त्री का जीवन खुद में खुश कभी नहीं रह पाता ||
