खुद को खुद में ढूँढ
खुद को खुद में ढूँढ
ब्रह्ममुहूर्त में उठकर बंदे, थोड़ा ध्यान लगाएगा।
खुद को खुद में ढूँढ रे तू, अनमोल रत्न पा जाएगा।
ब्रह्म मुहूर्त की बेला में कुछ सम्मोहन है।
शीतल मदिर मदिर वायु में आकर्षण है।
उस बेला में सात चक्र पर ध्यान लगा तू।
जग को तूने दिया है कितना सोच जरा तू।
यह भी सोच कि जग से तूने पाया कितना?
जितना पाया, क्या दे सकता उतना?
शांति की तलाश में वन- वन नहीं भटकना।
कर्म किये जा, शांति मिलेगी, कृष्ण का कहना।
कर्महीन प्राणी जीवन में सदा भटकता।
उसके जीवन में सौभाग्य कभी न रहता।
स्वप्न देखता पड़े- पड़े ही वह सारा दिन।
कर्म किये बिन बिता दिए, उसने दिन अनगिन।
ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, यदि वह चिंतन करता,
ऑक्सीजन से युक्त हवा का सेवन करता,
कुछ सार्थक विचार तब उसके मन में आते।
जीवन में तब बहुत बड़ा परिवर्तन लाते।
सुबह-सुबह पंछियों के दिनचर्या को देखकर,
कर्म योग का ज्ञान स्वयं ही समझ में आता।
