STORYMIRROR

Bhawna Sharma

Abstract

3  

Bhawna Sharma

Abstract

खोज खुद की

खोज खुद की

1 min
237

खोजूं खुद को हर पल इस संसार में।


मिला ना मुझसा कोई अनोखा इस किरदार में।

मन का डर मेरा मैं ही बन गया।


मैं खुद के लिए ऐसा दारिया बन गया।

गिरते संभलते मैं खुद से लड़ गया है।


ना जाने कब मैं खुद के लिए।

कब एक पहेली बन गया।


चलता अकेला मैं ।

मैं कब काफ़िर बन गया।


खो कर खुद को ।

मैं गमो आशिक बन गया।


खोजूं खुद को हर पल इस संसार में।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract