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Shahwaiz Khan

Abstract Tragedy

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Shahwaiz Khan

Abstract Tragedy

ख़ानाबदोश

ख़ानाबदोश

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में जब किसी ठहरे हुये पानी में अपना अक्स देखता हूं

और सोचता हूं

वक्त ने अपने साँचे में कितना बदला है

मुझी को नही ये ज़माना भी साथ बदला है

मगर कुछ नहीं बदला है


मेरी आवाज़ की तरहा तेरी आँखो के जुगनुओं की तरहा

जो आज भी मेरे लिए कुतुब तारा है

तलब और तड़प में जुदा कुछ तो नही

तेरी जुदाई ने मगर ये फ़र्क़ ही मिटा दिया

अब दुनिया बहुत कम ज़हन में रहती हैं


बेगाने से अपने हो गये

जैसे जर्मी के ऊपर फैले आसमाँ में चाँद तो हो

और सितारे कहीं खो गये है

जैसे कोई ख़ानाबदोश

बस्तियाँ सैलाब के हवाले करके

अनाम सी मन्ज़िल की चाह में चल पड़े


किसी बादल सा

कहीं थमें कहीं चले

कहीं बरस पड़े

तपती सी धूप में किसी पेड़ के साये का मिलना


मुक़द्दर की बात है मगर

जो मुमकिन ना हो

जो होनी में ना हो

वो नहीं होता मेरी जाँ

वरना दुनिया में क़या नहीं होता।


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