*कब सूरज चमकेगा*
*कब सूरज चमकेगा*
कब सूरज चमकेगा, कब ये घना कुहासा होगा दूर?
मन मयूर नाचेगा, सबके चेहरों पर छाएगा नूर।
नया वर्ष तो मना लिया था सबने एक जनवरी को,
जनवरी बीतने आई है, रवि अब तो आकर दर्शन दो।
उन लोगों पर रहम करो जो फुटपाथों पर सोते हैं।
शीत ऋतु में कितने प्राणी जान तलक खो देते हैं।
ऋतु बसन्त की आने वाली,दिखता कहीं बसन्त नहीं,
गहरा धुंध कुहासा है,अब तक पलाश भी खिला नहीं।
आकर बुहार दो घना कुहासा, अपना जादू बिखराओ।
बहुत ढा चुके सितम सूर्य, अब और न हमको तड़पाओ।
पौधों को थोड़ा खिलने दो, सड़कों का रूप निखरने दो।
कड़ी शीत से कंपकंपाते लोगों पर थोड़ा रहम करो।
उम्मीद का दामन छूट जाऐ,उससे पहले ही दर्शन दो।
होली भी आने वाली है,टेसू को जरा महकने दो।
हाथों को फैलाकर पौधे, कर रहे तुम्हारा आवाहन।
किरणों के रथ पर बैठ धरा पर दर्शन दो, हे सप्तवाहन !
