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Harsh Singh

Inspirational

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Harsh Singh

Inspirational

कैसी ये हुज़ूम खड़ी?

कैसी ये हुज़ूम खड़ी?

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बाहर लोगों की हुज़ूम बढ़ी , पूछ रहे कैसी ये भीड़ लगी 

एक दूजे से बात हुई , न जाने कैसी ये चाह नयी 

बड़े बड़ों से बात हुई , लेकिन किसी की न दाल गली 

अंदर बैठा मदमस्त मैं , समझा नहीं इनका दांव सही 

नहीं मैं कोई मशहूर सितारा , मिलने जिससे भीड़ चली 

मैं हूँ बस भारत का एक वीर बहादुर , हुआ राख ना हुई हार अपनी 

मैं तो लेटा सोच रहा हूँ , रास्तों का कोई अंत नहीं 

जहाँ से ज़िन्दगी पायी थी मैंने , पहुँच रहा हूँ मैं वही 

अग्नि में भष्म होकर मैं , मग्न हो गया कहीं 

लोग क्या कहेंगे मुझको , इज़्ज़त का अब कोई मोह नहीं 

कड़ी से कड़ी जोड़ता कवि मैं , भटक गया मैं अन्यत्र कहीं 

देशप्रेम की सबको राह दिखाकर , मैं भी चल दिया वहीं।



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