कैसी ये हुज़ूम खड़ी?
कैसी ये हुज़ूम खड़ी?
बाहर लोगों की हुज़ूम बढ़ी , पूछ रहे कैसी ये भीड़ लगी
एक दूजे से बात हुई , न जाने कैसी ये चाह नयी
बड़े बड़ों से बात हुई , लेकिन किसी की न दाल गली
अंदर बैठा मदमस्त मैं , समझा नहीं इनका दांव सही
नहीं मैं कोई मशहूर सितारा , मिलने जिससे भीड़ चली
मैं हूँ बस भारत का एक वीर बहादुर , हुआ राख ना हुई हार अपनी
मैं तो लेटा सोच रहा हूँ , रास्तों का कोई अंत नहीं
जहाँ से ज़िन्दगी पायी थी मैंने , पहुँच रहा हूँ मैं वही
अग्नि में भष्म होकर मैं , मग्न हो गया कहीं
लोग क्या कहेंगे मुझको , इज़्ज़त का अब कोई मोह नहीं
कड़ी से कड़ी जोड़ता कवि मैं , भटक गया मैं अन्यत्र कहीं
देशप्रेम की सबको राह दिखाकर , मैं भी चल दिया वहीं।
