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Shakuntla Agarwal

Abstract Classics

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Shakuntla Agarwal

Abstract Classics

"काँटा"

"काँटा"

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कंटक भरा जीवन सफ़र,

संभल - संभलकर चलना प्राणी,

गम ज्यादा, खुशियाँ हैं कम,

सोच - सोच पग धरना प्राणी,


डाली से टूटा फूल मुरझाया,

काँटों को मुरझाने का खौफ नहीं,

शूल बन उतर गया जो,

फिर दर्द का इल्म नहीं,

कली बनी, खिल न सकी,


कुचल दी गई खिलने से पहले,

रखवालों ने ही नोच डाला,

जो सिसकती थी कभी,

काँटा चुभने से पहले,

तन की पीड़ा तो सहलूंगी,

मन के घाव कैसे भरूँगी,


कितना गहरा काँटा चुभा दिल में,

उसका दर्द कैसे बयाँ करूँगी,

दर्द देकर उफ़ नहीं करते,

दुनिया का यही दस्तूर है,

होठों को सीलों,

आँसू पीलो,

"शकुन" तुम्हारी यही तक़दीर है।


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