STORYMIRROR

Raskhan Kavya

Classics

0  

Raskhan Kavya

Classics

कानन दै अँगुरी रहिहौं

कानन दै अँगुरी रहिहौं

1 min
305


कानन दै अँगुरी रहिहौं, जबही मुरली धुनि मंद बजैहै।

मोहिनि तानन सों रसखान, अटा चढ़ि गोधुन गैहै पै गैहै॥

टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि, काल्हि कोई कितनो समझैहै।

माई री वा मुख की मुसकान, सम्हारि न जैहै, न जैहै, न जैहै॥


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics