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मिली साहा

Abstract

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मिली साहा

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काग़ज़ से सीखा

काग़ज़ से सीखा

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मन की बात मन में रह जाए, दर्द नहीं कोई इससे तीखा,

मन में आए तूफ़ान को शांत करना मैंने काग़ज़ से सीखा,


संभाला उन पलों में काग़ज़ ने जब साथ सबने था छोड़ा,

काग़ज़ से सीखा तन्हाई में कैसे जाता है खुद को संभाला,


तब एक- एक शब्द को जोड़ा मैंने, एक सुंदर माला बनाई,

काग़ज़ से जुड़कर ही तो क़लम की अहमियत समझ आई,


दबी हुई अपने अंदर की इस प्रतिभा को मैंने पहचाना तब,

जब काग़ज़ के मैदान पर बिखरी, मन के भावों की स्याही,


कोरा होकर भी काग़ज़ का अस्तित्व होता है कितना सुदृढ़,

काग़ज़ से सीखा, संभव हर कार्य है गर कर लो निश्चय दृढ़,


कितना भी फैले अंधकार, होता है प्रकाश का एक झरोखा,

रुकना नहीं कभी, निरंतर चलते रहना काग़ज़ से ही सीखा,


बनी पहचान मेरी, मेरे शब्दों से, जो बाहर निकलकर आया,

है कोरा नहीं व़जूद मेरा इस सफ़र में, काग़ज़ से ही सीखा।


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