Rekha Shukla
Action Inspirational
बिखरने के तो लाख बहाने मिल जायेगे
आओ हम जुड़ने के अवसर ढूंढे....
यह जरूरी नहीं कि हर शख्स
हमसे मिलकर खुश हो
मगर हमारा प्रयास यह रहे कि,
हमसे मिलकर कोई दुखी न हो।
ज़ख़मी सांसे ...
माँ
रूठे
शब्द
एक लम्हां सो ...
पायल
ख़ुदा
रंग कलम से बे...
सैयो
ओ' परवर दिगार...
इसके आगे जग ने सदा डाला, हथियार। प्यार किसी एक रिश्ते…………. इसके आगे जग ने सदा डाला, हथियार। प्यार किसी एक रिश्ते………….
फिर एक राजकुमार है आया, माँ पापा को पराया बनाया। फिर एक राजकुमार है आया, माँ पापा को पराया बनाया।
एक दिन के लिए ही सही, तुम भी कभी, मां बनकर दिखाओ ना एक दिन के लिए ही सही, तुम भी कभी, मां बनकर दिखाओ ना
मुझको ना तुम समझो अबला, मैं दुर्गा रूपी नारी हूं। मुझको ना तुम समझो अबला, मैं दुर्गा रूपी नारी हूं।
बहुत जल्दी सब सही होगा हम ये विश्वास जगाते है। बहुत जल्दी सब सही होगा हम ये विश्वास जगाते है।
सोच बड़ी, हर मौसम सुहाना हो जाएगा। बड़ी सोच रखें, और………….. सोच बड़ी, हर मौसम सुहाना हो जाएगा। बड़ी सोच रखें, और…………..
इसकी आवाज़ करीबन 10 किलोमीटर तक सुनाई दी थी। इसकी आवाज़ करीबन 10 किलोमीटर तक सुनाई दी थी।
जहाँ हम, अपने सुख दुःख फरियाद कर सकते है, जहाँ हम, अपने सुख दुःख फरियाद कर सकते है,
बचपन में मां ने उठना, बैठना, बोलना सिखाया। बचपन में मां ने उठना, बैठना, बोलना सिखाया।
जो हो गया है गुम इस नर्सरी की फौज में जो हो गया है गुम इस नर्सरी की फौज में
एक-दूजे के लिए आँखें बिछाना, एक और एक ग्यारह सदा रहना। एक-दूजे के लिए आँखें बिछाना, एक और एक ग्यारह सदा रहना।
मेहनत करना आदत में शामिल नहीं है, बिना मेहनत व्यापार में नफा चाहिए। मेहनत करना आदत में शामिल नहीं है, बिना मेहनत व्यापार में नफा चाहिए।
सुख चैन सब गँवा फिर भी संतुष्टि नहीं। सुख चैन सब गँवा फिर भी संतुष्टि नहीं।
अंधकार रुपी जीवन को तू प्रकाशमान कर दे अंधकार रुपी जीवन को तू प्रकाशमान कर दे
मेरे अपने यूं मुझसे दूर चले गए, मैं जाता देखती रही रोक ना पाई, मेरे अपने यूं मुझसे दूर चले गए, मैं जाता देखती रही रोक ना पाई,
हमारी तरफ हाथ बढ़ाई हमने जोर से आवाज लगाई हमारी तरफ हाथ बढ़ाई हमने जोर से आवाज लगाई
सुख दुःख को मैं इक तराजू में ही नापता हूँ सुख दुःख को मैं इक तराजू में ही नापता हूँ
पर फिर भी नारी हर चुनौती मजबूती से पार करती है। पर फिर भी नारी हर चुनौती मजबूती से पार करती है।
बात समझने की यही की प्रगति मोह से रुकी नहीं सच्चाई तो यही केसरिया पगड़ी झुकी नहीं। बात समझने की यही की प्रगति मोह से रुकी नहीं सच्चाई तो यही केसरिया पगड़ी झुकी ...
तबीयत बिगड़ी तब समझ आया, अब पछतावा, कुछ हाथ ही नहीं आया। तबीयत बिगड़ी तब समझ आया, अब पछतावा, कुछ हाथ ही नहीं आया।