जुर्रत
जुर्रत
छोटे से इस पत्ते की
जुर्रत को सलाम
घेरे हुए हैं हर ओर उसे
रूखी सूखी टहनियां
निष्प्राण,नीरस मिट्टी
अस्तित्व विहीन एक पौधा
बेजान,निरीह,जला जला
नही संचार कहीं जीवन का
जीवन की वह अद्भुत डोर
एक उत्सव का पैगाम लिए
तत्पर है फिर उगने को
हरी हरी उन पत्तियों को
रोकने की राह न कोई
जीवन को जीने की
फलने-फूलने की यह ललक
करती है अचंभित सदा मुझे
प्रकृति की यह अपार शक्ति
जो होती है संचरित
संपूर्ण सृष्टि में
यही ललक बसी हम सब में है
मन में झांकने की है बस देर
राख़ के ढेर में दबा वह अंगारा
है मौके की तलाश में,कि कब
सूरज की धूप,आसमां की पनाह
होगी मयस्सर
हौसलों की नहीं दिखती है हद
हर पत्ते की जुर्रत को सलाम!
