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Shelly Gupta

Abstract

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Shelly Gupta

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जो ख्वाब अधूरे रह गए

जो ख्वाब अधूरे रह गए

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कुछ ख्वाब अधूरे रह गए थे

सो सहेज कर मैंने रख लिए

सोचा था सही समय आने पर पूरा करूंगी

सो बांध गठरी तब तक किनारे रख दिए

उलझ गई फिर उलझनों में

ज़िन्दगी की उल्टन पलटनों में

कैसी गठरी कैसे ख्वाब

ख्वाब भी ख्वाबों में रह गए

किसी ने खोल दी गठरी

 गलती से एक दिन

बिखर गए वो पीले पड़े ख्वाब

कुछ टूट गए ,कुछ बिखर गए

कुछ जीवन सागर में बह गए

मेरी आंखों के सामने

मुझे ही छोड़ चले मेरे ख्वाब

पता था अब अलविदा कह देना चाहिए

इन ख्वाबों को

पर कह ना सकी

मुंह जो उनसे मोड़ना चाहा

तो वो भी मोड़ ना सकी

कैसे छोड़ देती उन्हें जिन्हें 

जीवन भर संभाला था

पल पल जिन्हें

उम्मीदों से पाला था

सो उठ खड़ी हुई फिर से

एक दृढ़ निश्चय के साथ

पोंछा, सहेजा सब ख्वाबों को एक साथ

अब वक़्त आ गया है

अब और देर ना करूंगी

जितने भी ख्वाब अधूरे रह गए

सबको अब पूरा करूंगी।


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