जन्नत
जन्नत
मजबूरी अनेक हो पर माँ का विकल्प तो जन्नत भी नही
क़सीदे लाख पढ़ो जिहाद-ए-जहन्नुम तुमने सोचा कैसे।
इन्सानी हकूक मिटा अपनी जननी को शर्म सार न करो
आख़िर क्यो उजड़ते हो चमन किसी माँ के बेटों का तुम !
वालिदा तुम्हारी, हो या किसी और की बद्दुआएँ मिलेगी
कोई कोम जन्नत नहीं दिला सकेगी खुदा तो माँ मे बसे !
