जन्नत का पता
जन्नत का पता
वो पूछते हैं जन्नत का रास्ता किधर को है,
हम इशारा करते हैं आपकी गली का।
हज़ार बार बुलाया है हमें उस जन्नत ने,
हमें नशा है मगर सिर्फ आपकी तजल्ली का।
वो पूछते हैं अबके दिन जन्नत वहाँ है नहीं,
हम कहते हैं जरिया हमारे दिल से निकलता है उनका।
ख़ुदा भी देखता होगा ये हैरत-ए-इश्क़ से,
के जन्नत खुद ढूंढती है अब पता उनका।
पलकें झपकाता है आसमाँ, लाखों फरिश्ते की है तू जान,
तुझे देख कर होश खोते हैं सारे तारे,
तू इस कायनात का सबसे हसीन अरमान।
मेरा पूरा जहाँ तेरी आँखों में समाया है,
गहराई है उनकी दरिया की सीमा।
हमें अब किनारे की दरकार ही नहीं,
के उनकी हर नज़र है रहमत-ए-करीमा।
होने से आपके जहाँ है कायम, बरसात की पहली बूंद है आपकी हँसी।
महकने लगती है रूह की मिट्टी भी,
हवाओं में घुल जाती है एक अजीब सी ख़ुशी।
खूबसूरती उन ज़ुल्फों की बयान क्या करें,
खुदा ने वो लफ्ज़ बनाए ही नहीं।
सियाह रातों ने वहीं ली है पनाह अपनी,
ऐसे हसीन साये किसी ने सजाए नहीं।
तो चाँद एक धड़कता हुआ, चोरी से मुझको ही तकता हुआ,
वो शरमाया है तेरी सूरत को देख,
बादल में पीछे सरकता हुआ।
वो पलकें, धड़कना रोक देती हैं दिल हमारा, झपकते ही एक दफ़ा।
होश-ओ-खिरद सब फ़ना हो गए हैं,
क़त्ल कर गई हमें उनकी ये हसीन अदा।
जहाँ का कोई आसरा नहीं इस मुसाफिर को, छाँव तेरी पलकों की है आख़िरी आशियाँ।
दुनिया की भीड़ में खुद को खो दिया था हमने,
मिले तुम तो शायर को अपना पता मिल गया।
🌹अंकित मिश्रा :-)

