जंग का मैदान
जंग का मैदान
था जंग का मैदान बड़ा
लिए हाथ में तलवार खड़ा
थे हौसले फौलाद से
और अपनी जिद पर अड़ा
सामने थे दुश्मन बड़े
कुछ नीचे कुछ रथ पर चढ़े
देख के इनको दम भरा
दुश्मन की फौज की और बढ़ा
हाथ में थी चमकती तलवार
जो दुश्मन पर कर रही थी वार
सिपाही सेनापति और राजा
यह था सबसे लड़ा
धरती हुई लहूलुहान
लगती थी जैसे कोई शमशान
अपने चारों ओर देखकर लाशें
यह था मायूस खड़ा
क्या पाया किसने इस जंग से
चारों और मची हुड़दंग से
सोचता के हुई जीत
या हार का सामना करना पड़ा
था जंग का मैदान बड़ा
लिए हाथ में तलवार खड़ा।
