ज़माने भर का
ज़माने भर का
ज़माने भर का ग़म उठाए फिरते हो
क्या रंज है जो छिपाए फिरते हो
कभी तो आओ देहरी पर हमारे
हर गम को भूल जाओगे शब से पहले
गर मुस्कुराओगे तो जिंदगी गुलज़ार हो
रोने से कौन से मसले सुलझाए बैठे हो
हंसोगे तो हंसेगी दुनिया तुम्हारे साथ
आंसुओं पर तो कहीं गुमनाम बैठे हो
जिंदगी जंग है जीतोगे गर हिम्मत की
हारोगे ,जो गैरों से उम्मीद लगाए बैठे हो
माजी की यादों से होकर सरजद
मुस्तकबिल को यूं भुलाए बैठे हो
जिंदा हो तो नजर आना जरूरी है
दुनिया मां का आंचल नहीं जो मुंह को छिपाए बैठे हो

