STORYMIRROR

Rukhsar parveen

Romance Fantasy Inspirational

4  

Rukhsar parveen

Romance Fantasy Inspirational

ज़माने भर का

ज़माने भर का

1 min
377

ज़माने भर का ग़म उठाए फिरते हो

क्या रंज है जो छिपाए फिरते हो


 कभी तो आओ देहरी पर हमारे

  हर गम को भूल जाओगे शब से पहले


 गर मुस्कुराओगे तो जिंदगी गुलज़ार हो

रोने से कौन से मसले सुलझाए बैठे हो


 हंसोगे तो हंसेगी दुनिया तुम्हारे साथ

 आंसुओं पर तो कहीं गुमनाम बैठे हो


 जिंदगी जंग है जीतोगे गर हिम्मत की

हारोगे ,जो गैरों से उम्मीद लगाए बैठे हो


माजी की यादों से होकर सरजद

 मुस्तकबिल को यूं भुलाए बैठे हो


 जिंदा हो तो नजर आना जरूरी है

 दुनिया मां का आंचल नहीं जो मुंह को छिपाए बैठे हो   



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance