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Kalpesh Vyas

Abstract

5.0  

Kalpesh Vyas

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ज़िन्दग़ी से वार्तालाप

ज़िन्दग़ी से वार्तालाप

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241


कभी-कभी फूलों की तरह तू

महकती रहती है, ऐ ज़िन्दग़ी 


कभी-कभी पंछीओं की तरह तू

चहकती रहती है, ऐ ज़िन्दग़ी


कभी-कभी शोलों की तरह तू 

दहकती रहती है, ऐ ज़िन्दग़ी


समय की तरह पलपल तू

चलती रहती है, ऐ ज़िन्दग़ी


पानी की तरह खलखल तू

बहती रहती है, ऐ ज़िन्दग़ी


ना थकती है न रुकती है 

तू चलती रहती है ऐ ज़िन्दग़ी


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