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Vijay Kumar parashar "साखी"

Inspirational

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Vijay Kumar parashar "साखी"

Inspirational

"जिंदगी पिघलती रही"

"जिंदगी पिघलती रही"

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जिंदगी पिघलती रही,एक आइस्क्रीम की तरह

हम पानी ढूंढते रहे,दरिया में एक लहर की तरह


किनारे को ढूंढते-ढूंढते थक गये,मांझी की तरह

यह दुनियादारी डुबो गई,हमको सुनामी की तरह


जिंदगी फिसलती रही,हाथों से बस रेत की तरह

हम कोयलों में हीरा ढूंढते रहे,एक अंधे की तरह


वो ही खिले फूल,पतझड़ में सावन की तरह

जो शूलों का दर्द सहकर हंसे,गुलाब की तरह


यह जिंदगी भीख में न मिली,भिखारी की तरह

इसे आगे बढ़कर छीनना पड़ता,साहसी की तरह


जग जंगल है,गीदड़ भरे,कीड़े-मकोड़ो की तरह

तुझे शेर बनकर जीना है,लड़ शिकारी की तरह


जो अडिग रहे,अपने संकल्प पर चट्टानों की तरह

उन्होंने बहाया झरना,पत्थरों पर बहादुरों की तरह


जिंदगी पिघलती रही,एक आइसक्रीम की तरह

हम खड़े-खड़े देखते रहे,बस बुजदिल की तरह


खुद को बनाया,जिसने दलदल में कमल की तरह

फिर मुस्कुराता रहेगा वोअंधेरे में दीपक की तरह!



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