जिंदगी का सफा
जिंदगी का सफा
रुठे रुठे से मेरे हुजूर...नज़र आते हैं
पास होकर भी... वो दूर नज़र आते हैं
क्या खता थी.. अब तक समझ ना पाए हैं
उनकी बेरुखी पर... अश्क आंँखों से छलक आए हैं
दर्द का दरिया....हम उनसे ही छुपाते हैं
वफाएं इश्क की... हर रस्म को निभाते हैं
दिल के जज़्बात... हम उनको बताना चाहते हैं
वो हमसे ही ... मुंँह फेर चले जाते हैं
मनाऊं कैसे.... अपने रूठे हुए बलम को मैं
बस इसी सोच में....हर पल हम घुले जाते हैं
उल्फत ने उनकी....हमें इस कदर मजबूर किया
बिना गलती के भी... हम इलतेजा करें जाते हैं।
