STORYMIRROR

ritesh deo

Abstract

4  

ritesh deo

Abstract

जिंदगी का सफा

जिंदगी का सफा

1 min
333

रुठे रुठे से मेरे हुजूर...नज़र आते हैं

पास होकर भी... वो दूर नज़र आते हैं


क्या खता थी.. अब तक समझ ना पाए हैं

उनकी बेरुखी पर... अश्क आंँखों से छलक आए हैं


 दर्द का दरिया....हम उनसे ही छुपाते हैं

 वफाएं इश्क की... हर रस्म को निभाते हैं


 दिल के जज़्बात... हम उनको बताना चाहते हैं

 वो हमसे ही ... मुंँह फेर चले जाते हैं


 मनाऊं कैसे.... अपने रूठे हुए बलम को मैं

 बस इसी सोच में....हर पल हम घुले जाते हैं


 उल्फत ने उनकी....हमें इस कदर मजबूर किया

 बिना गलती के भी... हम इलतेजा करें जाते हैं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract