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Asha Padvi

Abstract Romance

4  

Asha Padvi

Abstract Romance

जीवनसाथी

जीवनसाथी

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4

न जाने कब चलते चलते मंजिल मिल गई,

खुशियों की मुझे नई चाबी मिल गई ।

न पता उसको था, न मुझे पता,

राहें एक थी मंजिल की तलाश थी।

कुछ कहा हमने ,कुछ उसने कहा,

हाथों को थामे जाने कहां को चले।

हम राही से कैसे ,कब जीवनसाथी बन गए 

अब शब्दों की कहा जरूरत ,आखे ही सब कहती है ,

मेरी हर दुवा अब तुम्हारी खुशियों में बहती है ।

एक दूजे में कुछ इस तरह खो गए है हम,

की धड़कन मेरी,पर साँसे तुम्हारी चलती है ।

हर धड़कन के साथ , मैं बस तुमसे जुड़ा,

हर बंधन के पार भी, मै बस तुमसे जुड़ा।

तेरी ख्वाइशें अब मेरी भी हो चुकी हैं,

तेरी राहों में मेरी नजरे आ झुकी है।

थोड़ी थोड़ी तकरार थी , बहुत सारा प्यार ,

पलभर का इनकार था, जन्मो का इकरार ।

जिन में कही वो थे ,कही थे हम ,

न कोई शिकायत थी ,न था कोई गम।

यादों के झरोखों से जब मुड़के देखे हम ,

मुस्कान वो प्यारी आई नज़र , वो प्यार का मौसम ।

फिर से दिन जी उठे हम , जिनमें वो नहीं थे ग़ुम ,

हमराही, हमसफर, हमनवा मेरे हमदम ।



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