जीव और ब्रह्म
जीव और ब्रह्म
बिना किसी रूप के ब्रह्म की उपासना अत्यंत कठिन है..
"निर्गुण को कौन रूप?
कैसे माने मन अरूप?
जाने ऐसे ब्रह्म की
कौन सी कहानी है?
आए जब श्याम रूप।
व्योम वर्ण धरि अनूप।
राधिका मही उर
नेह पीर अकुलानी है।
निश्चल मन धारि श्याम
देखति छवि आठों याम।
श्याम में हूँ आपु बिम्ब
देखि हर्षानी हैं।
जैसे बूँद सागर में।
बिलाइ भई एक रूप।
ऐसी ही जीव और
ब्रह्म की कहानी है।
