STORYMIRROR

Archana Verma

Abstract

4  

Archana Verma

Abstract

इश्क़ का विषपान

इश्क़ का विषपान

2 mins
601

जब से इश्क़ का विषपान किया

मैं पूर्ण खुद को पाती हूँ

कितना भी कड़वा हो ये विष इसे पी कर

मैं श्री शंकर सी मलंग रहना चाहती हूँ


मैं बस तेरा ध्यान लगाए हुए

सिर्फ तेरी धुन में रहती हूँ

तू मुझ में बसा कस्तूरी की तरह

फिर भी तुझ को ढूँढा करती हूँ

तू यहीं कहीं है मेरे पास

ऐसे जाने कितनी मृग तृष्णा

पार करती हूँ

जब से इश्क़ का विषपान किया

मैं पूर्ण खुद को पाती हूँ


ये सुलगता इश्क़ जब से तन

पर लगाया है

कोई और श्रिंगार तुम बिन न

मन को भाया है

इसकी भस्म को तन पर रमा के

तेरी खुशबू सी महक जाती हूँ

अब किसी और इत्र का क्या साथ करूँ

जब सिर्फ तेरी तिशनगी में खुद

को डूबा पाती हूँ

जब से इश्क़ का विषपान किया

मैं पूर्ण खुद को पाती हूँ


मुझे न चिंता तुम्हें भुलाने की

न किसी व्यसन की लत लगाने की

तेरा इश्क़ ही काफी है

अब इस पर कोई और नशा चढ़ता नहीं

अब रोज़ इसका दो कश लगाती हूँ

और तुम्हारी यादों  से खुद को खींच

ज़िन्दगी की और बढ़ती जाती हूँ

जब से इश्क़ का विषपान किया

मैं पूर्ण खुद को पाती हूँ


इश्क़ न आसान था उनके लिए

जिनकी भक्ति हम करते हैं

राधा-कृष्ण को ही देख लो

जिनकी उपासना सब करते हैं

दोनों अलग हो के भी साथ हैं

युगों युगांतर के लिए

सीता माँ की विरह वेदना

श्री राम को भी तो सताती होगी

जब सती हो गई माँ सती अग्नि में

तो श्री शिव को भी पीड़ा हुई होगी

जब ईश्वर ही न बच सके

विधि के विधान से

तो हमारी क्या हस्ती है

यहीं सोच मैं मंद मंद मुस्काती हूँ

जब से इश्क़ का विषपान किया

मैं पूर्ण खुद को पाती हूँ

कितना भी कड़वा हो ये विष इसे पी कर

मैं श्री शंकर सी मलंग रहना चाहती हूँ



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract