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pakhi Maurya

Romance Classics

4.7  

pakhi Maurya

Romance Classics

इश्क-ए-इबादत और खामोश दुआ

इश्क-ए-इबादत और खामोश दुआ

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सुबह की पहली सोच हो तुम, रात की आखिरी आस, 

मेरी रूह की हर उलझन का, तुम ही तो हो इलाज।

तुम्हारी हर एक बात पर, मेरा हक जताना सही, 

राहें कठिन मगर, यह कोई बड़ी बात नहीं।

तुम्हारी हंसी से जगमग, मेरी अपनी दुनिया होती है, 

तुम्हारी आंख के हर आंसू पर, मेरी सांसें रोती हैं।

तुम्हारी बेरुखी पर दिल में, गुस्सा खूब उमड़ता है, 

पर तुमसे बिछड़ने के डर से, यह दिल और संभलता है।

अंजाम क्या होगा इसका, यह तो पता नहीं, 

बस एक लंबा इंतज़ार है, कोई फैसला नहीं। 

पलकों के पीछे इश्क़ छिपा, जुबां पे एक खुमारी है, 

दिल के वीरानी में भी, बस तेरी दावेदारी है।

सबकी अपनी-अपनी नज़र है, सबका अपना-अपना चांद, 

कोई भटके राहों में, कोई दिल में ले बांध। 

दुनिया की इस भीड़ में, हर नज़र की अपनी पहचान, 

पर मेरे इस रूहानी सफ़र में, बस तेरी रूह मेरी जान।

अगर है खुदा की मर्जी, तो मिला ही देगा वो कभी, 

लाख अड़चनें हों राहों में, पर छिपी है उसकी खुशी। 

इस इंतज़ार के हर पल में, एक गहरा राज़ छिपा है यही, 

कि मिल जाएंगे हम दोनों, किस्मत के मोड़ पर वहीं।

        

         तेरी नाराजगी पर भी, मेरा कोई बस नहीं चलता, 

इस रूह पर तेरे सिवा, किसी और का हक नहीं चलता। 

जख्म भी तेरा दिया है, मरहम भी तू ही है, 

तुझसे रूठकर भी ऐ जान, मेरा इश्क़ तू ही है।



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