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Rashi Maurya

Abstract others classics

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Rashi Maurya

Abstract others classics

कुछ

कुछ

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 कुछ हरे है, कुछ भरे है है

कुछ खास है, कुछ पास है

कुछ अभी भी साथ है

कुछ मैं है कुछ मैं थे

कुछ कहते है कुछ कहते थे

कुछ सुनने नहीं, कुछ सुनाएं नहीं

कुछ सामने लाएं नहीं

वक्त कभी था ही के समझ पाए के

दर्द तो गहरे है।

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यह रचना जीवन के बदलाव, रिश्तों के उतार-चढ़ाव और स्मृतियो के बेहद संवेदनशील और गहरे पहलुओं को बयां करती है।

रिश्तों का आना-जाना: "कुछ हरे हैं, कुछ भरे हैं... कुछ अभी भी साथ हैं" यह जीवन में लोगों के सफर और कुछ खास रिश्तों के अब भी बने रहने को दर्शाता है।

अनकही खामोशियाँ: "कुछ सुनने नहीं, कुछ सुनाएं नहीं / कुछ सामने लाएं नहीं" यह उन दबी हुई भावनाओं और संवादों की कमी को उजागर करता है जो चाहकर भी व्यक्त नहीं हो पातीं।

समय की विडंबना: "वक्त कभी था ही के समझ पाए के / दर्द तो गहरे हैं" यह अंतिम पंक्ति पूरी कविता का केंद्र है। यह दर्शाती है कि रिश्ते और उनके भीतर छिपे दर्द इतने गहरे थे कि उन्हें समझने के लिए कभी पूरा वक्त ही नहीं मिला।


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