नारीत्व का नौवाँ अंक
नारीत्व का नौवाँ अंक
न सूरज सी जिद है, न चाँद सा अभिमान,
भीतर दोनों का तेज, बाहर सहज मुसकान।
जड़ों से जुड़ी जो सदा, गगन छुए उसका आधार,
ऐसी नारी रचे, सुंदर ये संसार।
स्वयं का मान जाने जो, न करे अहंकार
दूसरों के जीवन में जो भरे खुशियाँ अपार।
त्याग में जो सिंधु सी, और खुद में चट्टान,
ऐसी नारी से ही है सृष्टि का सम्मान।
नयन में शीतलता है, जिगर में है अंगार,
परंपरा के धागों से गुथा उसका संसार।
स्वतंत्रता की उड़ान भरे, खुद की ही पहचान,
बिन बोले ही कह जाती वो अपनी हर इक शान।
जैसे अंक नौ में सिमटा सृष्टि का हर ज्ञान,
वैसे ही परिपूर्ण नारी—त्याग, शक्ति, वरदान।
न अड़ियल, न विनीत अति, बस गज़ब का संतुलन,
जिसके दम पर महकता, जीवन का कण कण।
