इन्तिख़ाब
इन्तिख़ाब
आज यह मौसम कितना सुहाना है।
ऐसे मौसम का मजा हमें उठाना है।
मिलने आ रही हो ना तुम बोलो या
आज भी कोई नया सा बहाना है।
हजारों में एक तुम ही इन्तिख़ाब हो
कैसे कह दूँ पीछे ज़ालिम जमाना है।
अंदाज-ए-इश्क़ चला साथ-साथ मेरे
अदाएं तिरे सच में बड़ा क़ातिलाना है।
यहाँ वहाँ कहाँ-कहाँ ढूँढ़ रही तू हमें
तेरे दिल में ही तो मेरा आशियाना है।
दोनों के दरमियां जो दूरियाँ बढ़ गई
क़रीब चले आओ ना उसे मिटाना है।
तुमसे दूर होकर ही इश्क़ को जाना है।
अपना तो तेरा दिल ही एक ठिकाना है।

