STORYMIRROR

राही अंजाना

Abstract

4  

राही अंजाना

Abstract

इल्जामों की फेहरिस्त

इल्जामों की फेहरिस्त

1 min
369

यहाँ हर कोई एक दूजे की जान लेने को बैठा है, 

हर छोटी सी बात पर ही इम्तेहान लेने को बैठा है।


एक के बाद एक इल्जामों की फहरिशत लगाके,

जिसे देखो हमराहों का एहतराम लेने को बैठा है।


गम्भीर अवस्था में ये कैसी व्यवस्था है चारों तरह,

जहाँ नासमझ कोई जैसे एहसान लेने को बैठा है।


बांध ज़ंजीरों के बाद भी शायद कमी रही है कोई,

जो बेरहम आज भी मेरी पहचान लेने को बैठा है। 


मुश्किल हुआ अब और सब्र रहा नहीं इस मन में, 

पर अब भी ये 'राही' खुद रमज़ान लेने को बैठा है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract