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Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract

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Vijay Kumar parashar "साखी"

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ईर्ष्या

ईर्ष्या

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किसी के प्रति की गई कोई ईर्ष्या

जलाती है, हमारे खुद का ही जिया

जो ये बात समझ जाता है, पिया

वो खिलाता है, पतझड़ में बगिया


पर लोग यहां पर कहां मानते है,

ईर्ष्या से वो खुद को ही डांटते है,

खुद के हृदय में पाली गई ईर्ष्या

खुद का ही बुझाती है, यहां दीया


पर जो भी ईर्ष्या से प्रेरणा लेते है,

वो खुद को कर्म की सीख देते है,

जो उलटी लहरों में तैराते कश्तियाँ

वो ईर्ष्या में खिलते बनकर कलियां


ईर्ष्या बर्बाद करती है, वो जिंदगियां

जिन सांसो में जलती ईर्ष्या बत्तियां

ईर्ष्या से रखते जो हमेशा से दूरियां

वो ही बनते है, फ़लक की रोशनियां



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