हरित प्रिया
हरित प्रिया
हरित प्रिया हरि की वसुधा,
शॉंत करती यह सबकी क्षुधा,
जीवन दायिनी संम्पूर्ण करे कल्यान
हम देते कितना कष्ट बनके अज्ञान,
हरियाली का ऑंचल ओढ़े,
खुशियॉं देती दुख को छोड़े
हरी हरी धरती करे श्रृंगार
सौंदर्य स्वरूप है अपरम्पार,
सब जीवों पर कृपा बरसती,
सबका भरण पोषण यह करती,
मानव जात बड़ी नादान ,
करती जार जार अपमान,
मॉं मेरी है प्राणदायिनी,
भेदभाव से बिल्कुल अंजान,
काट दिये सारे वन उपवन,
जुटा लिये सारे संसाधन,
फिर भी रे मानव तुझको चैन ना आया ,
दूर दूर तक इसको उजाड़ अपना घर बसाया
अहं तुष्टि कर देने लगा प्रकृति को टक्कर
फिर माता नें रुप धरा भयंकर,
उलट पुलट कर दिया ममता भूलकर,
जो विनाश का फटा समुंदर,
ज्वालामुखी जो दबा था अंदर,
अब भी वक्त की पकड़ो नाजुक कलाई,
मॉं को रूष्ट किया तनिक लाज ना आई,
अपनी गलती स्वीकारें मॉ हम,
रक्षा करेंगे हरियाली की जब तक है दम,
मॉं क्षमा कर दो हम सबके अक्षम्य अपराध,
सीख मिली भरपूर कर दो फिर से सब आबाद,
मॉं तुम ममता की मूरत,
कितनी प्यारी तेरी सूरत,
मॉं तुम हो जीवनदायिनी,
मॉं मेरी तुम प्राणदायिनी,
नौ दिन ये पावन देते ये सीख,
अति हर चीज की ना होती ठीक..!!
