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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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हर पल तुम्हारे संग

हर पल तुम्हारे संग

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तुममें हैं,

और तुमसे हैं भारत !

तो लगता है हर पल तुम्हारे संग हैं।

यूँ तो हम मनुष्य हैं

स्त्री भी हैं पुरुष भी हैं

और तुम्हारे संग भर से


हमारी सिमिततायें भी कितनी असीमित हैं

दुनिया इसकी जिज्ञासा में है

अब भी

जब कि उसे

हमारे में प्रेम में होना चाहिये,

ऐसा न होना उसका दुर्भाग्य है।


लेकिन हम भी अजीब हैं

तुम्हारे संग भर होने से

उसके दुर्भाग्य को अपना दुर्भाग्य मानते हैं

और उसकी इससे मुक्ति की निरन्तरता में


सिमटते जा रहे हैं

सिमटते जा रहे हैं

एक अदद जीवन में।


हारते जा रहे हैं

हारते जा रहे हैं

उसी एक जीवन के लिये।


हमने सुना है अपने सन्तों से

मनुष्य होना सौभाग्य की बात है

पर मुनष्य होने का ये सौभाग्य

हमे धन्य कहता है।

सचमुच हम कृतज्ञ हैं

इस धन्यता के तुम्हारे संग।


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