होली
होली
होली
विधा-कविता
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रंग गुलाल बहार लेके,
घर आंगन आई होली,
रंग पिचकारी खेल रहे,
भिगो रहे जमकर झोली।
रंग बिरंगे चेहरे बन गये,
फाल्गुन का बड़ा त्योहार,
हर चेहरा मासूम लगता,
हर चेहरे पर बिखरे प्यार।
बुरा ना मानों होली आई,
कहकर फेंक रहे गुलाल,
बच्चे,बूढ़े,नर और नारी,
पिचकारी से करे कमाल।
दिल में होली जलती थी,
अब झलक रहा है प्यार,
लाल,पीले,हरे,गुलाबी रंग,
होली दुलेंडी का त्योहार।
बैर भाव अब भूल चुके,
मन में उमंग उठे हजार,
नहीं कोई अब चिंता है,
रंगों का होली त्योहार।
हर वर्ष आता यही है,
रंग बहारों का हो पर्व,
आपस में करे दोस्ती,
मन में पैदा हो गर्व।
रखना मन को खोल,
वरना खुल जाये पोल,
हँसी खुशी गुजार लो,
जिंदगी होती अनमोल।
रंग बिखरे जाते कभी,
छूटे जिंदगी की डोर,
सब कुछ धरा रहता,
आती है ऐसी भी भोर।।
