STORYMIRROR

Sudheer Kumar pal

Abstract

3  

Sudheer Kumar pal

Abstract

होली की कुंडलियां

होली की कुंडलियां

1 min
207

होली में जले बुराई,खिले प्रेम का रंग।

बैर भाव सब भूल के,मिले सब इक संग।।

मिले सब इक संग,छूटे हँसी के फव्वारे

उड़े रंग गुलाल कहीं,कहीं फूटत गुब्बारे

कह 'सुधीर' कविराय,बोलो मीठी बोली

मस्ती का त्योहार है,रंगो की होती होली।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract