हम क्यों करें?
हम क्यों करें?
साहित्यिक किताबें अंधविश्वास हैं,
उसी तरह जैसे कोई धर्म कहता हो—
"अच्छा करो, अच्छा होगा।
पाप मत करो।"
किताबें भी ऐसी ही बातें दोहराती हैं,
हम क्यों न खुद के लिए अच्छा करें?
क्या फर्क पड़ता है, कोई उसे पाप कहता हो!
धर्म कहता है—
"वसुधैव कुटुंबकम्,"
किताबें सिखाती हैं—
"सबसे प्रेम करो।"
पर यह दुनिया क्या सच में प्रेम से चलती है?
हम प्रेम क्यों करें?
बल्कि धर्म मानने वालों से नफरत क्यों ना करें!
धर्म कहता है—
"ईश्वर से डरो,"
किताबें कहती हैं—
"ईश्वर से डरो, और डरो पुलिस से, कानून से।"
सजा ना हो,
यह डर ही क्या नैतिकता का मापदंड है?
हम क्यों डरें?
ज़रा सोचो,
क्या सच में डर से ही व्यवस्था टिकी है?
या प्रेम, विश्वास, और समझ से भी कोई राह निकलती है?
अगर किताबें अंधविश्वास हैं,
अगर किताबें किसी और तरीके से वही कह रही हैं,
जो धर्म कहता है।
तो धर्म पर प्रश्न खड़ा करने वालों को,
किताबों पर प्रश्न करने वाले,
जल्दी मिलेंगे।
