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sandeeep kajale

Abstract

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sandeeep kajale

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हिना

हिना

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पत्ते टूटकर बिखरे डाली से

अजीब रिश्ता बना ख़याली से


सजना हाथों पे है इसका काम

रोशन करे चाहत का नाम


पत्थरोंसे घिसकर, ख्वाबोंमें रचती है

जर सुगागन के सपनोंसे सजती है


खुशबू से इसके भर आता है मन

इसके क़दमों से महकता है आँगन


अपने होठों से ना करे कोई तकरार

खुशियों के रंग रखती है बरकरार


गैरों के लिये खुद है पिसना

औरों की लिखे तू किस्मत,


 ऐ बेनाम हिना

ऐ बेनाम हिना।


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