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Kshama Sharma

Inspirational

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Kshama Sharma

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हे राम तुम कहाँ नहीं हो

हे राम तुम कहाँ नहीं हो

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हे राम तुम कब हो और कहाँ नहीं हो

तुम यहाँ हो और वहां नहीं हो ?


मेरे मन में हो और तन मैं हो ,

इस जग जन के हर मन में हो,

तुम आदि , अंत परायण हो,

तुम मेरी अमर रामायण हो। 


तुम चर में हो अचर में हो,

सृष्टि के हर कण में हो ,

तुम जड़ में हो चेतन में हो ,

अंतःकरण के अवचेतन में हो,


तुम युग भी हो कालांतर हो ,

या शरीर प्राण का अंतर हो ,

तुम भीतर हो और बहार हो ,

तुम शांत स्थिर कोलाहल हो। 


जागो तुमको अब बंधना होगा,

बस तत्त्व पदार्थ बनना होगा,

अब तुम्हारी सीमित परिणीति और प्रशासन है,

अयोध्यापति हो ये शासन का अनुशासन है। 


                       


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