"हे प्रकृति"
"हे प्रकृति"
हे! प्रकृति तुझसे कोई बात नही छुपती
कहर , जुर्म, ढाये है लोगो ने अब तू नहीं सहती
बोझ है तुझ पर कई करोङो लोगो का
सन्तुलन बनाकर तू अब बोझ कम करती
कमबख्त ये दिखती नहीं है बीमारी
अदृश्य बनी हुई ये घोर महामारी
घर मे घुसे लोग परेशान इस कदर
बरस रहा ये कहर आज शहर शहर
खुली इन फ़िज़ाओं में आज जहर घुल गया
भागा दौड़ी की जिंदगी में आज सब थम गया
मुहिम ही है ये जंग की येसी यारोँ
आज जो जहां था वहीं वो ठहर गया
लौटते थे लोग भी कभी अपने घरों को
आज वो ही अपना परदेशी हो गया।
