हे प्रभु! मानव बना दे
हे प्रभु! मानव बना दे
प्रभु! हर हृदय में कीजिए जागृत वे भाव,
स्वार्थ भाव मिटे,हो अपनेपन का ही अनुराग।
चेतन-जड़ में व्याप्त तू ,चेतना को ही जगा दे,
जगत के जड़बुद्धियों को हे प्रभु! मानव बना दे।
कुबुद्धि फेर में फॅंस दुर्व्यसनों से कुछ दुःखी हैं,
दूजे का सुख है , उनके दुःखों का मूल कारण।
क्षेत्र भाषा सम्प्रदाय में, उलझ भूले मानव धर्म,
वसुधैव कुटुम्बकम् भाव तज लड़ते अकारण।
भूले जो विषय तृष्णा के जाल में आबद्ध होकर,
पशुओं से भी जो पतित बोध कुछ उनको करा दे।
चेतन-जड़ में व्याप्त तू ,चेतना को ही जगा दे,
जगत के जड़बुद्धियों को हे प्रभु!मानव बना दे।
लक्ष्य जग आगमन का भुला दम्भ झूठे ज्ञान का,
सामाजिकता छोड़ सांसारिकता में जो फॅंसे हैं।
भ्रातृत्व संग मानवता को जो दे दी है तिलांजलि,
प्राण संस्कारविहीन भौतिकता में जिनके बसे हैं।
अधिकारों की चाहत में है कर्त्तव्यों को भुलाया,
उनके कर्त्तव्यों की सुधि प्रभु उनको भी करा दे।
चेतन-जड़ में व्याप्त तू ,चेतना को ही जगा दे,
जगत के जड़बुद्धियों को हे प्रभु!मानव बना दे।
सदा ही सभी हों निरामय और सभी सुखी हों,
जन-जन का जन-जन के प्रति होवे ऐसा भाव।
समता समरसता से परिपूर्ण हो अपनत्व भावना,
हर दिल से प्रभु हो जावे वैमनस्य का पूर्ण अभाव।
नफ़रत भेद द्वेष और ईर्ष्या भूलकर भी न फटकें,
हर दिल में हे प्रभु! ऐसी सुन्दर ज्योति जला दे।
चेतन-जड़ में व्याप्त तू ,चेतना को ही जगा दे,
जगत के जड़बुद्धियों को हे प्रभु!मानव बना दे।
