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Ranjana Mathur

Abstract


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Ranjana Mathur

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हे अंबुद! तू नीर बहा दे!

हे अंबुद! तू नीर बहा दे!

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प्रावृट की

आ गयी है बेला

मेघवृत्त हुआ है अम्बर

उड़त- फिरत

है श्यामल मेघावरि

हे अंबुद! तू नीर बहा दे !

हुआ प्रचंड दिवाकर अब तक

अग्नि बरसती है नभ से

त्राहि-त्राहि जीवात्मााओं में

जन-जीवन की तृषा मिटा दे

हे अंबुद ! तू नीर बहा देे !

चिंतक दादुर मयूरा पुकारे

तृष्णार्त

हुआ विहगवृंद

चौपाये बिन जल हैं आकुल

अब तो

जग की प्यास बुझा दे

हे अंबुद ! तू नीर बहा देे !

आस जगा कर

भूमि पुत्र की

कोरा तूू निर्घोष न कर

इस बंजर-सी

शुष्क अवनि को

हे तू मृदु बना दे

हे अंबुद ! तू नीर बहा देे !

पयोदेव कर बद्ध है अनुनय

सम्मुख तेरे

याचक हैं हम

कर फैलाकर मांगे भिक्षा

पुण्य सलिल अमृत बरसा दे

हे अंबुद ! तू नीर बहा दे !

सकल सृष्टि

हरीतिमा मांगती

क्या तरुवर

क्या वल्लरि क्या पादप

तेरी एक झलक पा मेघा

स्मित स्निग्ध

हर्षित होगी प्रकृति

पर्ण-पर्ण मुदित

तृण-तृण हिमिका दमकत

गाछ-गाछ झूमेंगे

संग तन्वंगियों के

तू नेह पीयूष बरसा दे

हे अंबुद ! तू नीर बहा दे!


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