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Anita Koiri

Abstract

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Anita Koiri

Abstract

हाथों में कांटे पकड़ कर

हाथों में कांटे पकड़ कर

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हाथों में गुलाब देकर जो सपने दिखाए थे

वो सारे सपने एक एक कर झड़ चुके थे

अब न तुम ही तुम थे

अब न मैं ही मैं थी

अब तक तो न बचा वो प्यारा गुलाब था

नून तेल लकड़ी में फंस चुके सिर्फ हम और तुम थे

अब गुलाब महकता न था

अब गुलाब के कांटे चुभते थे

फूलों की सेज पर बैठ कर सपने देखने वाले हम अब हम न थे।

हम तो जिंदगी के चालों से अंजान परिंदे थे

जिन्हें घर बनाना आता है

जिन्हें घर सजाना आता है

लेकिन जिन्हें तूफान से लड़ना नहीं आता

जिन्हें पतझड़ का मौसम नहीं भाता

हर बार तूफान आएगी

अपने साथ हमारे घरौंदे उड़ा ले जाएगी

हम और तुम देखेंगे बस मिलकर हाथों से गुलाब नहीं

हाथों में कांटे पकड़ कर।



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