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Chandan Kumar

Abstract

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Chandan Kumar

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"हाथ छाले वालों "

"हाथ छाले वालों "

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🥺"हाथ छाले वाले" 🫵

 हाथों में छाले,आँखों में सपना,
जिनका हर दिन होता अपना,
 न थकने की हिम्मत रखते हैं,
दर्द भी चुपचाप सहते हैं।

 नींवों में दबी जो आवाज़ें हैं,
वो मज़दूरों की साज़िशें हैं,
हर चोट में इक गीत छुपा है,
 हर आह में उम्मीद जगा है।

 भूखे पेट भी गुनगुनाते हैं,
बचों को ख्वाब सुनाते हैं,
 फटे कुर्ते में गर्व समेटे,
खुद से खुद की लड़ाई लड़ते।

 ना नाम कहीं, ना कोई पहचान,
 पर उनके बिना अधूरी है जान,
जिस दिन रुक जाएँ हाथ ये सारे,
थम जाएँगी साँसें शहरों के किनारे।

 मज़दूर है वो, मज़बूर नहीं,
 हर पत्थर पे उसकी छाप सही,
 आज नहीं, हर दिन उसका है,
श्रम ही सच्चा पूजा सा है।

 आओ झुकें उन हथेलियों पर,
जहाँ लिखा है वक़्त का फ़रमान,
मज़दूर दिवस बस एक नहीं,
वो हर दिन का सच्चा सम्मान।


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