हार नहीं मानूँगी
हार नहीं मानूँगी
टूट रहा था मनोबल कठिन जीवन संघर्ष के कारण।
नहीं मिल रहा था किसी समस्या का कोई निवारण।
तब देखा एक मकड़ी को अपना जाल बुनते लगातार।
तेज हवा के झोंके डाल रहे थे इसमें भारी व्यवधान।
वह पल पल गिर जाती थी पर हार नहीं मानती थी,
उसे यह जाल बुनना ही होगा,वह दिल में जानती थी।
क्योंकि यही जाल उसके बच्चों का सुरक्षा कवच बनेगा
और उसके परिवार को एक सुरक्षित भविष्य देगा।
तो फिर कैसे वह इस संघर्ष से मुँह मोड़ लेती?
कैसे वह मेहनत से अपना नाता तोड़ लेती?
वह जाल बुनने का निरंतर प्रयास करती रही,
बारंबार दीवार से गिरती रही,संभलती रही।
और अंत में पूरा जाला बुन कर ही वह जिद्दी मानी।
उसका साहस देखकर मैंने भी अपने मन में ठानी।
माना संघर्ष बहुत हैं, सफ़लता कभी तो मिलेगी ही।
डगर कामयाबी की,उन्नति के शिखर तक पहुँचेगी ही।
अब मैं भी कभी परिस्थितियों से हार ना मानूँगी।
कर्म पथ पर निरंतर बढ़ते हुए अपना लक्ष्य पालूँगी।
क्योंकि सफलता की सीढ़ी है,लगातार की गई कोशिश,
इस कठिन परिश्रम का नहीं है,कोई भी अन्य विकल्प।
