गुमनाम लफ्ज़
गुमनाम लफ्ज़
मंजिल है दूर का मगर रास्ते है नही आसान,
दूंडती है ये निगाहे हर उस रास्ते मे तुझे क्या करूँ
सिर्फ तेरे लिए ही तो बावला है मेरा ये पागल मन् ।
हर एक चहेरो के भीर के बिच मेरी ये निगाहें तरसते हुए दूंडती है हर जगह सिर्फ तुम्हे,
तूझे तो पता भी ना चला कब तुझपर हद से ज्यादा इतना मरने लगे ।
दूंडती हूई इन तरसते निगाहे हो जाती है बहोत उदास ना मिलने पर तुझे,
क्यूकी तुम्हारा एक झलक भी बहोत सूकून सा महसूस करवाता है मुझे।
दूंडती हूई इन तरसते निगाहे हो जाति है बहोत उदास ना मिलने पर तुझे,
क्यूंकी मेरे जान से भी ज्यादा जान हो तुम मेरे लिए !
क्यूंकि हां इतना सिद्दत मोहब्बत है तुमसे मूझे।
तेरे प्यार मे कब इतने गूम गए मूझे खुद पताही ना चला,
नाराजगी ओर गुस्से मे भी मैने सिर्फ तुम्हारा हिफाजत ओर भला ही अपने दूआउ मे मंगा
मगर कभी भी तुम्हारा बूड़ा हो एसा नही चहा,
क्यूंकि हां मैंने खुदसे भी ज्यादा इतना बेशुमार मोहब्बत सिर्फ तुमसे ही किया।

