गुलाब और काँटे
गुलाब और काँटे
एक ही ज़िन्दगी मिली हैं हमें जिसे जी रहे हैं सभी,
डगर जिसकी उबड़-खाबड़ पर चलना हैं सबकी मज़बूरी,
जिसमें समाहित हैं कितने दिन कितनी स्याह रात्रि,
अपने अपने भाग्य,कर्मों का बंधन लेकर आये हम नर नारी।।
इंसान गुलाम हैं प्रभु का उसकी संरचना ही ऐसी,
अपने हिसाब से किसी को मृत्यु दें ऐसी व्यवस्था की,
अपनों के तन को सहेजे नहीं अतः तन में बदबू पैदा की,
अनाज में कीड़े पैदा किये ताकि वो हर साल उगाये नयी,
विज्ञान की तरक्की पर पड़ती प्राकृतिक आपदाएं भारी।।
आते रहते कुछ ख़ुशी के तो कुछ ग़म के लम्हें यही ज़िन्दगी
समझिये कि बिछाए हुए राहों में गुलाब के संग काँटे भी,
जिसने लक्ष्य पर नज़र रखी उसे काँटे तो चुभेँगे ही,
गुलाब और काँटे को पर्याय मानो तो ज़िन्दगी भी ऐसी ही,
जैसे जन्म और मृत्यु पूरक एक दूसरे के, टाल सकते नहीं।
