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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Tragedy

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Tragedy

गरीबी

गरीबी

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गरीबी इंसान को कितना लाचार बना देती है ।

हालात को और खस्ताहाल कर बदतर करार देती है ।


जिसके फटी न बिवाई सो पीर पराई क्या जाने ?

जिसने गरीबी को देखा नहीं उसका क्या अहसास माने ?


मेवे मिष्ठान्न खाने वाले सूखी रोटी की मिठास क्या जाने ?

बोतलबंद पानी पीने वाले पोखर के जल का स्वाद क्या जाने ?


दुख होता है जब लोग खाने को डस्टबीन में फेंकतें हैं।

तो कोई क्षुधा बुझाने को जूठी पत्तलों से टुकड़ों को बीनते हैं ।


कोई खाना पचाने को दौड़ जिम जाता है कोई भूखे पेट सो जाता है।

गरीबी एक अभिशाप है उस में जन्मना ही पाप हो जाता है ।


कहीं कुत्ते मोटर में सवार होते है कहीं बच्चे नंगे पैर दौड़ते हैं ।

कहीं बागों मे सुमन झुलसता है तो कहीं कचरे मे गुलाब खिलता है ।


फैशन मे नग्न कोई , कोई तन ढकने को विलखता है ।

कोई महलों मे रोता है कोई फुटपाथ में भी बिहंसता है ।



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