गरीबी
गरीबी
गरीबी इंसान को कितना लाचार बना देती है ।
हालात को और खस्ताहाल कर बदतर करार देती है ।
जिसके फटी न बिवाई सो पीर पराई क्या जाने ?
जिसने गरीबी को देखा नहीं उसका क्या अहसास माने ?
मेवे मिष्ठान्न खाने वाले सूखी रोटी की मिठास क्या जाने ?
बोतलबंद पानी पीने वाले पोखर के जल का स्वाद क्या जाने ?
दुख होता है जब लोग खाने को डस्टबीन में फेंकतें हैं।
तो कोई क्षुधा बुझाने को जूठी पत्तलों से टुकड़ों को बीनते हैं ।
कोई खाना पचाने को दौड़ जिम जाता है कोई भूखे पेट सो जाता है।
गरीबी एक अभिशाप है उस में जन्मना ही पाप हो जाता है ।
कहीं कुत्ते मोटर में सवार होते है कहीं बच्चे नंगे पैर दौड़ते हैं ।
कहीं बागों मे सुमन झुलसता है तो कहीं कचरे मे गुलाब खिलता है ।
फैशन मे नग्न कोई , कोई तन ढकने को विलखता है ।
कोई महलों मे रोता है कोई फुटपाथ में भी बिहंसता है ।
