✍️ गरीब मजदूर हूँ साहब ✍️(21)
✍️ गरीब मजदूर हूँ साहब ✍️(21)
मैं तो गरीब
मजदूर हूँ साहब,
धरती को अपना
बिछोना बनाकर,
गगन को अपना
ओढ़ना बनाकर,
हर दिन अपना
एक नया भाग्य लिखकर,
दिन-रात मेहनत करता हूँ ,
जब जाकर पाता हूँ ,
अपने परिवार की दो वक्त की रोटी,
कभी-कभी तो भूखे ही रह कर
सो जाता हूँ,
मेहनत ही मेरी पूजा,
मेहनत से कभी पीछे नहीं हटता,
मेहनत से अपना
हर अंजाम लिखता हूँ,
मैं तो गरीब-मजदूर हूँ साहब,
रोज एक नई जिंदगी लिखता हूँ साहब !!
