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Ramashankar Roy

Abstract

4.5  

Ramashankar Roy

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ग्रामबाला

ग्रामबाला

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461



ऐ ग्राम बाला

ठहर कुछ और देर

स्मृतियों के द्वार

एक अदना सा प्रयास करूँ

शब्दो मे ढालने का

तेरी अनुपम रूपकला

कहाँ से आरंभ कँहा करूँ अंत

आपादमस्तक छुपा है

भंगिमाओं में काव्य अनंत

किस कवि की कल्पना हो तुम

किस शिल्पकार की रचना हो तुम

बता दो ना

सपना , की सच हो तुम

मैं होता अगर कवि

अंग - अंग पर तेरे काव्य होता

संभव नही , स्वीकार नहीं

आखिर उपमा कहाँ से लाता

अतुलनीय अप्रतिम लावण्य

कुमारसम्भव की तू पार्वती भी नही

जिसे कमल की पंखुड़ियां खरोच दे

हर पल प्रणय वाटिका में विचरती

शकुंतला भी तो है नहीं

ऐ ग्राम बाला

तू तो मेरे गाँव की सच्चाई है

कमर में हँसिया माथे पे खंचिया धर

घर बाहर रौंद आयी है

असुर्यमपश्या हो नहीं

फिर भी इंद्रों के नजर आई हो

जबसे सोलह के पार आई हो

नहीं जाना क्या होता है

पालने में झुलना

खिलौने के लिए जिद करना

मगर जान गई

गरीब के घर जवान बेटी होने का मतलब

तुमने नहीं देखा

स्कूल का दरवाजा

पलटा नहीं किताब का पन्ना

पढ़ कैसे लेती हो

समाज के चेहरे की हर लिपी

नमामी ग्राम बाला

बखूबी जानती हो

हालात से अनजान बनना

नैनो से ही सब कहना

मुझे सिर्फ यही कहना

कविता कभी मत बनना

बनना तुम खुली किताब

जिसका प्रत्येक वाक्य

क्रांति की ऊर्जा रखता हो !



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