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Vvk Gautam

Romance


4.8  

Vvk Gautam

Romance


ग़ज़ल-ए-इल्ज़ाम

ग़ज़ल-ए-इल्ज़ाम

1 min 186 1 min 186

आज ही, वो इश्क़ लड़ाने से बाज नहीं आयीं मुझसे,

सच में, सब्जी जल गयी तो इल्जाम मुझपर आ गया,


वो गुफ्तगू करती रही मुझसे मजाकिया अंदाज में,

रोटी गोल न बन सकी तो इल्ज़ाम मुझपर आ गया,


मेरे ज़ख्मों पे नमक लगा के वो हँसती रही इस कदर,

उन्हें दाल फीकी लगी तो इल्ज़ाम मुझपर आ गया,


जब थी वो मेरे साथ उनको हँसता देखा था किसी ने,

यूं चाँद की मायूसी दिखी तो इल्ज़ाम मुझपर आ गया,


इस हसीने जहां में प्यार करते थे हम बहुत एक दूसरे से,

हमारे बीच जब नफ़रत घुली तो इल्ज़ाम मुझपर आ गया,


सहता रहा मैं रेज़ा रेज़ा ग़म-ए-जद्दोजहद की ख़्वाहिशें को,

ख़्वाहिशें मेरे प्रति मिटने लगी तो इल्ज़ाम मुझपर आ गया ,


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